लोकतंत्र के चुनाव में मानवीय लोकतंत्र कही खो गया है !
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समझ में नही आता कि आज के चुनाव मानवीय लोकतंत्र का है या फिर गधो के लोकतंत्र का !
समझ में नही आ रहा कि क्या इस देश में विकास के सारे पैमाने पुरे हो चुके है और लोगों कि गरीबी -बेकारी ख़त्म हो चुकी है या फिर उसे ख़त्म करने कि जरुरत नही है !
क्या आप बता सकते हैं कि इस देश में बेरोजगारी ख़त्म हो चुकी है या फिर अभी बाकी है क्योंकि लोकतंत्र के चुनावो में उसका कोई जिक्र तक नही है !
क्या आप बता सकते हैं कि भ्रस्टाचार इस देश कि अहम् समस्या है या भ्रस्टाचार आज के लोकतंत्रीय व्यवस्थान में नैतिकता के पैमानों में शुमार हो चूका है !
किसी भी पार्टी अथवा नेता कि तरफ से गरीबी -बेकारी और भ्रस्टाचार मुद्दा नही है ! मानो इस देश के सारे मुद्दे
ख़त्म हो चुके है और हर भारतवासी , ऐसो -आराम और सुखमय जीवन जीने लगा हो !
सच कहूँ तो हमें शर्म आ रही है कि यह लोकतंत्र जो कभी मानवीय समस्याओ के समाधान के लिए बनाया गया था आज गधों के नुक्ताचीनी में लगा हुआ है और मानवीय समस्याओं से दूर होता जा रहा है !
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समझ में नही आता कि आज के चुनाव मानवीय लोकतंत्र का है या फिर गधो के लोकतंत्र का !
समझ में नही आ रहा कि क्या इस देश में विकास के सारे पैमाने पुरे हो चुके है और लोगों कि गरीबी -बेकारी ख़त्म हो चुकी है या फिर उसे ख़त्म करने कि जरुरत नही है !
क्या आप बता सकते हैं कि इस देश में बेरोजगारी ख़त्म हो चुकी है या फिर अभी बाकी है क्योंकि लोकतंत्र के चुनावो में उसका कोई जिक्र तक नही है !
क्या आप बता सकते हैं कि भ्रस्टाचार इस देश कि अहम् समस्या है या भ्रस्टाचार आज के लोकतंत्रीय व्यवस्थान में नैतिकता के पैमानों में शुमार हो चूका है !
किसी भी पार्टी अथवा नेता कि तरफ से गरीबी -बेकारी और भ्रस्टाचार मुद्दा नही है ! मानो इस देश के सारे मुद्दे
ख़त्म हो चुके है और हर भारतवासी , ऐसो -आराम और सुखमय जीवन जीने लगा हो !
सच कहूँ तो हमें शर्म आ रही है कि यह लोकतंत्र जो कभी मानवीय समस्याओ के समाधान के लिए बनाया गया था आज गधों के नुक्ताचीनी में लगा हुआ है और मानवीय समस्याओं से दूर होता जा रहा है !
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hi freinds come with me.